सीईए एक्ट के कड़े प्रावधानों से छोटे अस्पतालों पर बढ़ रहा बोझ, नियमों में व्यावहारिक बदलाव जरूरी

हल्द्वानी:- भारत में क्लिनिकल एस्टेबिलशमेंट एक्ट, 2010 (सीईए एक्ट) लागू हैं। यह देश के सभी सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों (अस्पतालों, क्लीनिकों और लैब) के पंजीकरण और विनियमन के लिए बनाया गया यह एक केंद्रीय कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना हैं। देश के सभी क्लीनिक, अस्पताल, नर्सिंग होम और डायग्नोस्टिक सेंटरों का इस अधिनियम के तहत रजिस्टर होना जरूरी है।
इस एक्ट के अनुसार चिकित्सा संस्थानों में बुनियादी ढांचा, योग्य कर्मचारी और आपातकालीन सेवाएं मानकों के अनुसार होनी चाहिए। अस्पतालों और क्लीनिकों को अपने यहाँ इलाज व जांच के शुल्कों (रेट लिस्ट) को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना जरूरी है। इलाज के दौरान मरीजों की सुरक्षा, स्वास्थ्य रिकॉर्ड का रख-रखाव और संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन करना भी अनिवार्य हैं।
सीईए एक्ट में सुधार की जरूरत: डॉ. दीपक अग्रवाल
सीईए एक्ट में जहां चिकित्सा संस्थान के लिए नियम बनाए गए हैं वहीं इसमें कुछ खामियां भी हैं। हल्द्वानी के श्री राम हॉस्पिटल के वरिष्ठ पीडियाट्रिक सर्जन और आईएमए सचिव डॉ दीपक अग्रवाल ने कहा कि इस एक्ट में कुछ खामियां भी हैं। इस एक्ट के तहत कड़े पंजीकरण नियमों के कारण नौकरशाही का खतरा बढ़ जाता है, जिससे अस्पतालों को चलाने में अनावश्यक प्रशासनिक बाधाएं आती हैं।

उन्होंने कहा कि मानकीकरण और बुनियादी ढांचे की सभी शर्तों को पूरा करने में भारी भरकम खर्च आता है, जिसे उठाना छोटे या कम बेड वाले अस्पतालों के लिए आर्थिक रूप से बेहद मुश्किल होता हैं।
उन्होंने कहा कि इलाज और सेवाओं की पैकेज दरें तय करने के प्रावधान कई राज्यों में व्यावहारिक और स्पष्ट नहीं माने जाते, जिससे अस्पतालों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती हैं।
डॉ दीपक अग्रवाल ने कहा कि आपातकालीन स्थिति (इमरजेंसी) में मरीज को स्थिर करने और मेडिकल रिकॉर्ड को इलेक्ट्रॉनिक रूप से सहेजने जैसे कड़े नियम बिना पर्याप्त बुनियादी ढांचे और सरकारी सहयोग के डॉक्टरों पर अनुचित दबाव बनाते हैं।
डॉ दीपक अग्रवाल ने कहा कि छोटे और बड़े अस्पतालों पर एक जैसे कड़े मानक थोपे गए हैं। जिससे कि छोटे अस्पतालों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। हर छोटे क्लीनिक पर ट्रेड नर्स और फार्मासिस्ट रखना व्यावहारिक नहीं हैं। कागजी कार्रवाई, बार-बार के निरीक्षण और नवीनीकरण से प्रशासनिक तनाव भी लगातार बढ़ता है। अनुपालन लागत बढ़ने से इलाज और जांच के खर्चे महंगे हो जाते हैं।
डॉक्टरों की सुरक्षा भी जरूरी, मारपीट की घटनाओं पर बने सख्त कानून
डॉ दीपक अग्रवाल ने कहा कि चिकित्सकों के साथ आये दिन मारपीट की घटनाएं हो रही हैं। जिसके चलते चिकित्सक अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। इसके लिए सख्त कानून बनाना बहुत ही जरूरी हैं।
उन्होंने कहा कि हर चिकित्सक चाहता है कि उसके मरीज का अच्छा इलाज हो और मरीज शीघ्र स्वस्थ होकर अपने घर जाए। मरीज की जान बचाना हर डॉक्टर अपना पहला कर्तव्य समझता हैं। कई बार मरीज की स्थिति बहुत ज्यादा खराब होती हैं, लेकिन फिर भी मरीज को बचाने का हमारा पूरा प्रयास किया जाता है । इस दौरान यदि यदि कभी कोई कैसे बिगड़ जाता है तो उसका सारा दोष चिकित्सक पर मढ़ दिया जाता है और डॉक्टर के साथ मारपीट की जाती है। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए सख्त कानून बनना बहुत ही जरूरी है
निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच हो बेहतर समन्वय
डॉ दीपक अग्रवाल ने कहा कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाने के लिए सरकारी अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय होना जरूरी है।
इस व्यवस्था के तहत विशेषज्ञ डॉक्टरों, आधुनिक चिकित्सा उपकरणों, जांच सुविधाओं और आपातकालीन सेवाओं का बेहतर उपयोग किया जा सकता हैं।
उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की कमी के लिए डिजिटल और टेलीमेडिसिन को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है जिससे मरीजों को दूरस्थ स्थानों पर भी बेहतर इलाज और परामर्श मिल सके।










