धुंधली होती दृष्टि को ना करें नजरअंदाज, शुरुआती दौर में मोतियाबिंद का आयुर्वेद से उपचार संभव

हल्द्वानी:- उम्र बढ़ने के साथ आंखों की रोशनी कमजोर का होना आम बात है, लेकिन वहीं सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या बहुत ज्यादा गंभीर है।
‘नेशनल प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस’ के अनुसार, आज भी देश में 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में दृष्टिहीनता (अंधापन) का सबसे बड़ा कारण मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) ही है। आमतौर पर लोग का मानना है कि इसका एकमात्र उपाय ऑपरेशन ही है। हालांकि, आयुर्वेद के अनुसार यदि शुरुआती अवस्था में ध्यान दिया जाए, तो सही दिनचर्या और उपचार से सर्जरी को टाला जा सकता है।
इस विषय पर श्री विश्व प्रांगण आयुर्वेद चिकित्सालय (मुखानी, हल्द्वानी) के वरिष्ठ नाड़ी वैद्य राहुल गुप्ता बताते हैं कि आयुर्वेद में मोतियाबिंद को ‘लिंगनाश’ कहा गया है। यह मुख्य रूप से शरीर में कफ और वात दोष के असंतुलन तथा पाचन क्रिया (मेटाबॉलिज्म) के कमजोर पड़ने से उत्पन्न होता है। जब शरीर में अपचित आहार और कफ की मात्रा बढ़ती है, तो आंखों के लेंस पर धुंधलापन छाने लगता है।

अनियमित खान-पान की ये गलतियां बढ़ाती हैं जोखिम
वैद्य राहुल गुप्ता के अनुसार, मोतियाबिंद केवल उम्र का असर नहीं है, बल्कि हमारी खराब जीवनशैली भी इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है।
गलत आहारः बहुत अधिक दही, पनीर, आलू, मैदा, पैकेटबंद और प्रोसेस्ड फूड, बासी या फ्रिज में रखा खाना, अधिक कच्चा सलाद और रिफाइंड तेल का खाना, अधिक कच्चा सलाद और रिफाइंड तेल का ज्यादा इस्तेमाल आंखों को नुकसान पहुंचाता है।
बिगड़ी दिनचर्याः दिन में सोना, रात में देर तक जागना, शारीरिक मेहनत की कमी और समय पर पेट साफ न होना भी इसका कारण बनता है।
दवाएं और अन्य बीमारियां: लंबे समय तक स्टेरॉयड या कुछ मानसिक रोगों की दवाएं लेने से भी आंखों का लेंस जल्दी खराब हो सकता है। इसके अलावा डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों में मोतियाबिंद का खतरा बहुत अधिक रहता है।
आयुर्वेद की कार्य प्रणाली क्यों है असरदार- आधुनिक चिकित्सा में मोतियाबिंद का एकमात्र समाधान सर्जरी और कृत्रिम लेंस लगाना है। वहीं आयुर्वेद रोग को जड़ से ठीक करने की दिशा में काम करता है। शुरुआती दौर में विशेष आयुर्वेदिक प्रक्रियाओं (जैसे लेखन अंजन) के जरिए आंखों में जमा अतिरिक्त कफ साफ किया जाता है। इसके बाद ‘नेत्र तर्पण’ (औषधीय घी से आंखों का पोषण) जैसी विधियों से वात दोष को शांत किया जाता है, जिससे लेंस का कड़ापन कम होता है। साथ ही कुछ आंतरिक औषधियों से पाचन और दृष्टि दोनों में सुधार लाया जाता है।
आंखों को स्वस्थ रखने के 6 आसान नियम- पाठकों की सुविधा के लिए वैद्य राहुल गुप्ता ने कुछ सरल और असरदार घरेलू उपाय साझा किए हैं।
सुबह का त्राटकः रोज सुबह सूर्योदय के समय 10 से 15 मिनट शांत मन से त्राटक (किसी निश्चित बिंदु या ज्योति को बिना पलक झपकाए देखना) का अभ्यास करें। इससे आंखों के अंदर तरल पदार्थों का बहाव ठीक रहता है।
नाक में तेल डालना: आयुर्वेद में नाक को सिर और आंखों का द्वार माना गया है। रोज सुबह 2-2 बूंद अणु तैल नाक में डालें।
रसांजन का प्रयोगः आंखों के भारीपन और कफ को दूर करने के लिए हफ्ते में एक बार शुद्ध रसांजन की सलाई आंखों में आंजें। इससे निकलने वाले आंसुओं के साथ आंखों का मैल और अतिरिक्त कफ बाहर आ जाता है।
सिर के केंद्र की मालिशः सिर के ठीक बीच में (जहां चोटी रखी जाती है) रोजाना तिल के तेल की कुछ बूंदें लगाकर हल्के हाथ से मालिश करें। यह आंखों की नसों को तनावमुक्त रखता है।
बकरी के दूध की पट्टी: कंप्यूटर या मोबाइल पर देर
तक काम करने के बाद ठंडे बकरी के दूध में रुई भिगोकर 10 मिनट बंद पलकों पर रखें। इससे आंखों की थकान तुरंत दूर होती है।
पाचन का ध्यान रखें: प्यास से ज्यादा पानी न पिएं, ताकि पाचन अग्नि कमजोर न हो। इसके अलावा खाना खाने के तुरंत बाद नहाने से बचें।
किसी भी लक्षण के दिखने पर स्वयं इलाज करने के बजाय कुशल आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। विशेषज्ञ परामर्श हेतु 7895372936 पर संपर्क किया जा सकता है।









